Wednesday, April 15, 2015

सावन के महीने में भगवान शिव धरती पर भ्रमण पर आते हैं



सावन के महीने में भगवान शिव धरती पर भ्रमण पर आते हैं
कहते हैं सावन के महीने में स्वयं भगवान शिव पृथ्वी पर भ्रमण करते हैं। इसलिए इस विशेष महीने में भक्तगण शिव की पूजा-अर्चना में रम जाते हैं। आइए, हम उनके विभिन्न नामों को जानकर उन्हें नमन करें। शिव महाकाल हैं। औघड दानी हैं। भोले शंकर हैं। महामृत्युंञ्जयहैं। सर्वशक्तिमान हैं। वे देव हैं, देवाधिपतिहैं, हर हर महादेव हैं। महायोगीहैं। नटराज हैं। तीन आंख वाले हैं, क्रोधी हैं, तो अतिशीघ्र प्रसन्न भी होते हैं, अजन्मा हैं, सदा से हैं। मनुष्य रूप हैं, अरूप भी हैं। गंगा उनकी जटाओं से निकली हैं, सांप उनके गले में है, जो योग का कमाल है।
यहां गले में सांप के साथ विष भी है। देवासुर संग्राम में समुद्र मंथन से निकला विष उन्होंने ही पी लिया। वे विषपायीभी हैं। वे संहारक त्रिशूल रखते हैं, लेकिन गायन वादन के लिए डमरू भी है। वे परम ज्ञानी हैं। वे महा-नर्तक भी हैं। वे निराले देव हैं। वे भारत के महादेव, देवाधिपति शिवशंकर हैं। वे भारत की देवत्रयी ब्रह्मा, विष्णु और महेश में से एक अतिमहत्वपूर्ण विराट दिव्य ऊर्जा हैं। शिव विश्व आस्था हैं।
भारत, मिस्र,यूनान, इटली, फ्रांस, अमेरिका आदि अनेक देशों में शिव की उपासना की जाती है। इस्लाम आने के पूर्व काबा क्षेत्र में शिव की 360 मूर्तियां थीं। इनमें शिव लिंग भी था। शिव समूचे भारत में मूर्ति के रूप में पूजे जाते हैं। भौतिक जगत की प्रत्येक वस्तु क्षरणशील है - क्षर है। यह इंद्रिय गोचर रूप-आकार है। उसमें विद्यमान अक्षर आत्मानुभूति का विषय है।
भारत में प्रत्येक व्यक्ति, कीट पतंगे, वनस्पति और अणु-परमाणु में भी परम ऊर्जा के तत्व देखे जाते हैं। जहां-जहां दिव्यता वहां-वहां देवता-यही भारतीय संस्कृति की अनुभूति है। ऋग्वेद में एक दिलचस्प देवता हैं रुद्र। वे तीन मुंह वाले हैं। वे साधकों का पोषण करते हैं तथा उन्हें मोक्ष भी दिलाते हैं। यही रुद्र भारत में लोकप्रिय महादेव हैं। रुद्र ऋग्वेद में ही शिव भी हैं। ऋग्वेद के प्रथम मंडल के सूक्त 114 में 11मंत्र हैं। सभी मंत्र रुद्र देव को अर्पित हैं। रुद्र यहां जटाधारी हैं। वे अपने हाथ में दिव्य आरोग्यदायी औषधियां रखते हैं। स्तुतिकत्र्ताओंको मानसिक शांति देते हैं। मनुष्य शरीर में मौजूद विष दूर करते हैं। मंत्र [1-6] में प्रार्थना है कि वृद्धों को न सताएं, बच्चों को हिंसा में न लगाएं। माता-पिता की हिंसा न करें। गौओंको आघात न पहुंचाएं। मंत्र [7-8] में वे मरुद्गणोंके पिता कहे गए हैं। सुरक्षा के लिए उनकी स्तुतियां की जाती हैं। मंत्र [9-11] ऋषिगण रुद्र का निवास पर्वत की गुहा में बताते हैं, उन्हें नमस्कार करते हैं।
चौथे मंत्र में वे रुद्र को शिवेन वचसा कहते हैं, अर्थात शिव हैं। पांचवें में वे प्रमुख प्रवक्ता, प्रथम पूज्य हैं। वे नीलकंठ हैं। [मंत्र 8]फिर वे सभा रूप हैं, सभापति भी हैं। [मंत्र 24]सेना और सेनापति भी हैं। [मंत्र 25]वे सृष्टि रचना के आदि में प्रथम पूर्वज हैं और वर्तमान में भी विद्यमान हैं। वे ग्राम गली में विद्यमान हैं, राजमार्ग में भी। वायु प्रवाह, प्रलय वास्तु सूर्य चंद्र में भी वे उपस्थित हैं [मंत्र 37-39]।मंत्र 64,65 व 66 में अंतरिक्ष व पृथ्वी में स्थित रुद्र को नमस्कार किया गया है। रुद्र और शिव एक हैं। उनकी हजार आंखें और भुजाएं हैं। वे योगी हैं। अथर्ववेद के 11वें अध्याय का दूसरा सूक्त रुद्र सूक्त कहा जाता है। रुद्र यहां भव [उत्पत्ति] हैं। [मंत्र 3]के अनुसार, वे अंतरिक्षमंडल के नियन्ता हैं, इसलिए उनको नमस्कार है। [मंत्र 4 मंत्र 5]में वे समदर्शी अर्थात सभी को एकसमान रूप में देखते हैं।

आदि शंकराचार्य विरचितं "श्रीमहिषासुरमर्दिनि स्तोत्रं" ..



अयि निज हुँकृति मात्र निराकृत धूम्र विलोचन धूम्र शते
समर विशोषित शोणित बीज समुद्भव शोणित बीज लते ।
शिव शिव शुंभ निशुंभ महाहव तर्पित भूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥
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O One who has blown aside hundreds of streams of smoke coming from demonswith smoking eyes merely with her own roaring...
who is like a vine of blood-drops grown from the dried blood drops in battle...
One who delights in the company of auspicious Shiva, Shumbha, Nishumbha and the spirits who were fed during the great battle...
Be victorious, be victorious, O destroyer of the demon Mahisha, with beautiful braids of hair, daughter of the mountain Himalaya...
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... आदि शंकराचार्य विरचितं "श्रीमहिषासुरमर्दिनि स्तोत्रं" ...

10 स्वप्नों का ?



इंसान इच्छाओं को जाग्रत अवस्था में पूरा नहीं कर पाता, तब वह स्वप्न देखना शुरु कर देता है, जैसे-जैसे मानव-मन स्वप्नों के साथ गहरा संबंध बना लेता है, वह उनमें खोने लगता है। ऐसे कई उदाहरण हैं, जिनमें समस्याओं का निदान स्वप्न में सहज रूप में लोगों को मिल जाता है।
संसार में ऐसा कोई मनुष्य नहीं है, जिसे स्वप्न न आते हों। अमूमन सपने सभी देखते हैं। इसलिए हम यहां स्वप्न-संबंधी केवल उन अवधारणाओं की ही चर्चा करेंगे जो मनुष्य के भावी जीवन की सुख-दुःख की घटनाओं की भविष्यवाणियां करतीं हैं।

1. जो व्यक्ति स्वप्न में शेर, घोड़ा, हाथी, सफेद बैल या रथ पर स्वयं को सवार देखता है, वह अवश्य ही गांव, नगर राज्य या देश के सर्वोच्च पद पर आसीन होता है।


2. स्वप्न में बहुमूल्य पात्र में जलपान या भोजन करने वाला व्यक्ति राज्य की ओर से सम्मान प्राप्त करता है।


3. सपने में किसी का सिर काटना या अपना या किसी अन्य का कटा सिर देखना शुभकारी होता है। ऐसा व्यक्ति अकस्मात् काफी धन का स्वामी हो जाता है।


4. कोई व्यक्ति स्वप्न में स्वयं को हाथी पर सवार होकर किसी नदी के किनारे चावल (भात) खाता देखता है, वह अवश्य ही राज और वैभव को प्राप्त करने में सफल हो जाता है।


5. स्वप्न में कपास, हड्डी, भस्म, खोपड़ी, शूल, चक्र या फांसी देखने वाले को रोग, दुख, धन हानि, क्लेश भुगतना पड़ सकता है।


6. स्वप्न में जिस व्यक्ति को किसी का सिर केशरहित दिखता है, उसे बुरी आदतों से छुटकारा मिल जाता है।


7 स्वप्न में फलों को देखना बहुत ही शुभ माना गया है।


8. स्वप्न में किसी की हत्या होते देखने का अर्थ है कि कोई आपके खिलाफ बगावत कर रहा है।


9. यदि कोई व्यक्ति सपने में किसी बच्चे को रोते देखेगा तो उसे अवश्य ही कोई दुःख भरा समाचार सुनने को मिलता है।


10. सपने में भेड़िया देखना संतान के द्वारा धनलाभ का सूचक होता है।

मृत्यु के बाद वापस जीवित




मृत्यु के बाद वापस जीवित
जीवन का सबसे बड़ा और अटल सत्य है मृत्यु। कोई चाहे कितना ही ताकतवर क्यों ना हो, खुद को शक्तिशाली क्यों ना मानता हो, सच यही है कि जन्म लेने के साथ ही उसकी मौत का समय भी तय हो जाता है। मौत का डर इंसान को भयभीत तो करता है लेकिन हकीकत यही है कि मृत्यु का अनुभव व्यक्ति को जीवन की सच्चाई बता जाता है।
आपने मृत्युपूर्व आभासों के विषय में जरूर सुना होगा। हमने पहले आपको इसके विषय में बताया था। आज हम आपको कुछ ऐसे आभासों या अनुभवों के बारे में बताने जा रहे हैं जो मृत्यु से तुरंत पहले महसूस किए जाते हैं। जब इंसान का मस्तिष्क यह अनुमान लगा लेता है कि अब वह कुछ ही पलों का मेहमान है तो वह कुछ ऐसी उधेड़बुन में फंस जाता है जो उसने पहले कभी अनुभव नहीं की थी।
हर धर्म और समाजों में विभिन्न प्रकार के आभासों के बारे में उल्लेख किया गया है। धर्म से जुड़े होने के कारण बहुत से लोग यह मान सकते हैं कि मृत्युपूर्वाभासों जैसा कुछ नहीं होता। लेकिन जब विज्ञान स्वयं इस बात पर मुहर लगा देता है कि वाकई मरने से चंद मिनट पहले या मृत्यु हो जाने के चंद पलों बाद तक इंसान कुछ सोचता रहता है, तो वाकई यह बात एक तथ्य के तौर पर स्वीकृत हो जाती है।
वैज्ञानिकों द्वारा संपन्न सर्वेक्षणों के अनुसार मृत्यु के समीप पहुंचकर जो अनुभव होते हैं वे एक व्यक्ति का भौतिक दुनिया से जुड़ाव तो कम करते ही हैं साथ ही उसे उस रास्ते पर चलने के लिए भी प्रेरित करते हैं जो आत्मा को गंतव्य स्थान तक पहुंचाता है।
मनुष्य अपने शरीर के साथ-साथ अपनी आत्मा और ज़हन के मरने का भी अनुभव करता है। यह अनुभव किस तरह के होते हैं इसका उल्लेख हर धर्म में विभिन्न प्रकार से किया गया है।
कई बार ऐसी घटनाएं घटित होती हैं जब मौत के मुंह में पहुंचने के बाद व्यक्ति को जीवनदान मिल जाता है। आपने ऐसे भी कई किस्से सुने होंगे जब अंतिम संस्कार के समय ही व्यक्ति दोबारा जीवित हो उठता है। इन्हीं लोगों के साक्षात्कार के आधार पर प्राप्त परिणामों को वैज्ञानिकों ने अपने शोध की स्थापनाएं बनाया है।
सबसे पहले एक ऐसी महिला का उदाहरण, जिसकी पास की नजर बहुत कमजोर थी। अमेरिका की रहने वाली यह महिला वेंटिलेटर पर अपनी अंतिम सांसें ले रही थी। कुछ देर में उसने महसूस किया कि वह नजरें कमजोर होने के बावजूद अपने पीछे रखी मशीन पर लिखे अंक देख पा रही है। इतना ही नहीं, उसने खुद को छत की ओर उड़ता हुआ पाया। उसे वहां लगी लाइट पर गंदगी दिखाई दी। कुछ देर बाद उसकी आत्मा ने फिर से शरीर में प्रवेश कर लिया। डॉक्टरों के अनुसार वह किसी भी क्षण मर सकती थी लेकिन मृत्यु के समीप पहुंचकर वह स्त्री वापस आ गई।
ठीक होने के पश्चात जब उसे वेंटिलेटर से हटाया गया तब उसने मशीन के अंक पढ़े और लाइट पर जमा गंदगी भी देखी। साइंस में इस तरह के अनुभवों को आउट ऑफ बॉडी एक्सपीरियंस कहा जाता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार व्यक्ति जिस वातावरण में पला-बढ़ा है, उसका धर्म और धार्मिक मान्यताएं, उसके मौत के निकट पहुंचकर होने वाले अनुभवों को बयां करते है। एक वयस्क जब नीयर डेथ एक्सपीरियंस का अनुभव करता है तो इस अनुभव में उसका मौत का डर, सामाजिक और धार्मिक वातावरण बहुत मायने रखता है।
लेकिन जब एक छोटा बच्चा इन अनुभवों से गुजरता है तो उसे कैसा महसूस होता है, क्योंकि उसे ना तो मौत का अर्थ पता होता है और ना ही उसे किसी प्रकार से धर्म का कोई जुड़ाव होता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि पांच से सात साल तक के बच्चे मृत्यु को नहीं समझते और ना ही उन्हें पूर्वजन्म की अवधारणा से कुछ लेना-देना होता है इसलिए उनके भीतर किसी प्रकार का भय नहीं होता। उन्हें भी कुछ ऐसे ही अनुभव होते हैं जो किसी वयस्क को हो सकते हैं।
वर्ष 1987 में हुई एक रिसर्च के अनुसार जब व्यक्ति मौत के निकट पहुंच जाता है तो वह जीवन को और बेहतर ढंग से समझने लगता है। वह धर्म-कर्म में दिलचस्पी लेने के साथ-साथ प्रकृति की भी सराहना करने लगता है। अपने सगे संबंधियों के प्रति उसका जुड़ाव बढ़ जाता है। ये सब होने के साथ-साथ उसका मौत से भय भी समाप्त होने लगता है।
हर धर्म में आत्मा के दो गंतव्य स्थानों का जिक्र किया गया है, एक नर्क और दूसरा स्वर्ग। ऐसा कहा जाता है कि जीवन में अच्छे कर्म करने वाले लोगों की आत्माएं स्वर्ग की ओर प्रस्थान करती हैं वहीं बुरे कर्म करने वाली आत्माएं नर्क जाती हैं।
व्यक्ति बहुत अच्छे से जानता है कि जीवनभर उसके कर्म अच्छे थे या बुरे। शायद उससे बेहतर कोई और यह बात जान भी नहीं सकता, इसलिए जब मौत उसके निकट होती है तब उसकी आत्मा अपने कर्मों के आधार पर ही स्वर्ग या नर्क जाने की यात्र शुरू कर देती है।
शोधकर्ताओं के अनुसार ईसाई, इस्लाम, हिन्दू, बौद्ध आदि सभी धर्मों में मृत्यु से पूर्व होने वाले अनुभवों का जिक्र है। उनका कहना है कि जब भी व्यक्ति नीयर डेथ एक्सपीरियंस की बात कहता है तो यह स्पष्ट है कि वह मौत को मात देकर आया एक दर्शक है, जिसने मौत को करीब से देखा है।
आस्तिकों और नास्तिकों के बीच बंटी इस दुनिया में जहां कुछ ईश्वर को सत्य मानते हैं वहीं नास्तिक ईश्वर के अस्तित्व पर कतई विश्वास नहीं करते। वे लोग जो ईश्वर को सच कहते हैं उनके लिए पूर्वजन्म भी एक सच है और साथ ही इससे जुड़े मृत्यु पूर्व आभास भी। लेकिन जिनके लिए ना ईश्वर कुछ है, ना जन्मों का फेर सच है, वे नीयर डेथ एक्सपीरियंस को किस तरह समझते हैं?
कुछ नास्तिक व्यक्तियों के साथ हुए साक्षात्कार के बाद ये बात सामने आई है कि किसी प्रकार का आध्यात्मिक झुकाव ना होने के बावजूद उन्हें भी आस्तिकों की ही तरह अनुभव होते हैं। वे भी जीवन को समझकर मौत के डर से मुक्त हो जाते हैं।
हां, कुछ नास्तिकों ने यह भी कहा है कि मृत्यु के पास पहुंचकर और वहां से वापस आने के बीच उन्हें किसी प्रकार का कोई अनुभव नहीं हुआ।
मौरो के अनुसार हिंदुओं में अजीब मान्यता है। वे स्वर्ग को एक विशाल नौकरशाही के तौर पर देखते हैं। भैंसे को कर्मों का हिसाब रखने वाले मृत्यु देव यमराज की सवारी माना जाता है इसलिए हिन्दू धर्म से जुड़े ऐसे लोग जिन्होंने मौत को बहुत नजदीकी से देखा है, का कहना है कि वह एक भैंसे के ऊपर बैठकर अपनी अंतिम यात्रा कर रहे थे।
बौद्ध धर्म से जुड़े लोग, जिन्होंने नीयर डेथ एक्सपीरियंस किया है उनके अनुसार उनकी अंतिम यात्रा काले पहाड़ों, गहरे समुद्र और आसपास रंगीन फूलों के रास्ते से गुजरी। उन्होंने इस दौरान महात्मा बुद्ध को अपने साथ देखा। वहीं हिन्दू धर्म के लोगों ने रास्ता तो यही बताया लेकिन उन्होंने बुद्ध को नहीं बल्कि कृष्ण को देखा था।
उपरोक्त अध्ययनों और जीवित व्यक्तियों के मृत्यु के निकट होने जैसे आभास को समझने के बाद यह कहा जा सकता है कि जीवित अवस्था में आपके विचार, आपके विश्वास, मरने के बाद आपकी यात्रा को बहुत प्रभावित करते हैं और इन सभी में धर्म भी एक बड़ा रोल निभाता है।

मंत्र का महत्व




मंत्र के विषय में वैदिक मत है कि मंत्र धर्म शास्त्रो एवं ग्रंथो से ली जानेवाली देवी देवताओ कि ऐसी प्रार्थना अथवा ऐसे शब्द का स्वरुप है जिसके जप या मनन से देवी देवताओ को प्रसन्न करके अपनी कामना पूर्ण की जा सकती है |मननात, त्रायते इति मंत्र : |अर्थात: जिसका मनन करने से जो त्राण करे, रक्षा करे उसे मंत्र कहते है |श्रीमद भगवत गीता में साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है की भेट तथा अर्पण में सर्वश्रेष्ठ जाप रूप अर्पण में हुँ |इसी प्रकार राम चरित मानस में गोस्वामी तुलसी दास ने मंत्र की महिमा का निम्न वर्णन किया है |कलियुग केवल नाम आधारा, सुमिर सुमिर नर पावहि पारा |मंत्र के जानकारो के अनुसार मनुष्य के भाग्य चक्र या कर्मो से उत्पन्न होने वाले दुखो का निवारण मंत्रो द्वारा किया जा सकता है | सांसारिक भोगो कि प्राप्ति एवं आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति हेतु मंत्र जप बहुत ही प्रभावशाली माना गया है | क्योकि मंत्र सभी प्रकार के सांसारिक दुखो को नाश करने वाले और मुक्ति प्रदान करने में पूर्ण रूप से समर्थ है | प्राचीनकाल से ही मंत्र जाप को हमारे ऋषि मुनियो ने बहुत सरल और कारगर उपाय माना है | पूर्ण श्रद्धा भक्ति से मंत्र जाप करने से निश्चित रूप से मनुष्य के सभी दुखो और पापो का शमन होता है |मंत्र जाप की सफलता में गुरु की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण होती है | बिना गुरु के मार्गदर्शन और आशीर्वाद के कोई भी व्यक्ति मंत्र सिद्ध करने में सफल नही हो सकता | इसी प्रकार गुरु ही तय करता है की कोनसा मंत्र, किस व्यक्ति पर जल्दी फलीभूत होगा |मंत्र सिद्धि प्राप्त करने के कुछ महत्वपूर्ण नियम :-* भूमि पर शयन * ब्रम्हचर्य का पालन* मौन * गुरु सेवा* त्रिकाल स्नान * पाप कर्मो का पूर्ण त्याग * नित्य पूजन * नित्य दान* इष्ट का पूजन* इष्ट और गुरु में विश्वास* जप में पूर्ण निष्ठाअतः मंत्र दिखने में छोटे होते है परन्तु उसका प्रभाव बहुत बड़ा होता है | हमारे पूर्वज ऋषि मुनियो ने मंत्र के बल से ही बहुत सी सिद्धिया और चिरस्थायी ख्याति प्राप्त कि है |

वो नष्ट हो जाता है



हिंदू धर्म में महिलाओं को बहुत ही आदर व सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। हमारे ग्रंथों में अनेक महान, पतिव्रत व दृढ़ इच्छा शक्ति वाली महिलाओं का वर्णन मिलता है। कुछ ग्रंथों में स्त्रियों के कर्तव्यों का वर्णन किया गया है तो कुछ में उनके व्यवहार के बारे में बताया गया है। इसी प्रकार महाभारत में भी स्त्रियों के संबंध में कुछ विशेष बातों का वर्णन किया गया है। यह बातें महाभारत के अनुशासन पर्व में तीरों की शैय्या पर लेटे हुए भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को बताई थीं। इनमें से कुछ बातें आज के समय में भी प्रासंगिक हैं। ये बातें इस प्रकार हैं-नहीं करना चाहिए स्त्रियों का अनादरभीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को बताया था कि जिस घर में स्त्रियों का अनादर होता है, वहां के सारे काम असफल हो जाते हैं। जिस कुल की बहू-बेटियों को दु:ख मिलने के कारण शोक होता है, उस कुल का नाश हो जाता है।लक्ष्मी का स्वरूप है स्त्रीभीष्म पितामह के अनुसार स्त्रियां ही घर की लक्ष्मी हैं। पुरुष को उनका भलीभांति सत्कार करना चाहिए। उसे प्रसन्न रखकर उसका पालन करने से स्त्री लक्ष्मी का स्वरूप बन जाती हैं।नाराज स्त्रियां दे देती हैं श्रापस्त्रियां नाराज होकर जिन घरों को श्राप दे देती हैं, वे नष्ट हो जाते हैं। उनकी शोभा, समृद्धि और संपत्ति का नाश हो जाता है। संतान की उत्पत्ति, उसका पालन-पोषण और लोकयात्रा का प्रसन्नतापूर्वक निर्वाह भी उन्हीं पर निर्भर है। यदि पुरुष स्त्रियों का सम्मान करेंगे तो उनके सभी कार्य सिद्ध हो जाएंगे।जहां होता है स्त्रियों का आदर, वहां देवता निवास करते हैंभीष्म पितामह के अनुसार यदि स्त्री की मनोकामना पूरी न की जाए तो वह पुरुष को प्रसन्न नहीं कर सकती। इसलिए स्त्रियों का सदा सत्कार और प्यार करना चाहिए। जहां स्त्रियों का आदर होता है, वहां देवता लोग 

जब अपनी ही पुत्री की ओर आकर्षित हुए ब्रह्मा



जब अपनी ही पुत्री की ओर आकर्षित हुए ब्रह्मा
हिन्दू धर्म से जुड़े पौराणिक इतिहास पर नजर डालें तो कई ऐसी कहानियां सुनने को मिल जाएंगी जिनसे अभी तक आमजन वाकिफ नहीं हैं। विस्तृत इतिहास होने की वजह से कुछ घटनाएं छूट जाती हैं तो कुछ नजरअंदाज कर दी जाती हैं। इन्हीं कहानियों में से एक हैं सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा का अपनी ही बेटी के साथ विवाह करने की घटना।
यह बात तो हम सभी जानते हैं कि त्रिदेव के हाथों में ही इस सृष्टि की बागडोर समाहित है। ब्रह्मा के पास सृष्टि की रचना का दायित्व है तो विष्णु के पास संरक्षण का, वहीं देवों के देव कहे जाने वाले महादेव शिव को विनाश का जिम्मा सौंपा गया है। इसी विनाश के बाद फिर से शुरू होता है सृजन का चक्र।
ब्रह्मा का अपनी ही बेटी के साथ विवाह करने की इस घटना का उल्लेख सरस्वती पुराण में वर्णित है। सरस्वती पुराण के अनुसार सृष्टि की रचना करते समय ब्रह्मा ने सीधे अपने वीर्य से सरस्वती को जन्म दिया था। इसलिए ऐसा कहा जाता है कि सरस्वती की कोई मां नहीं केवल पिता, ब्रह्मा थे।
सरस्वती को विद्या की देवी कहा जाता है, लेकिन विद्या की यह देवी बेहद खूबसूरत और आकर्षक थीं कि स्वयं ब्रह्मा भी सरस्वती के आकर्षण से खुद को बचाकर नहीं रख पाए और उन्हें अपनी अर्धांगिनी बनाने पर विचार करने लगे।
सरस्वती ने अपने पिता की इस मनोभावना को भांपकर उनसे बचने के लिए चारो दिशाओं में छिपने का प्रयत्न किया लेकिन उनका हर प्रयत्न बेकार साबित हुआ। इसलिए विवश होकर उन्हें अपने पिता के साथ विवाह करना पड़ा।
ब्रह्मा और सरस्वती करीब 100 वर्षों तक एक जंगल में पति-पत्नी की तरह रहे। इन दोनों का एक पुत्र भी हुआ जिसका नाम रखा गया था स्वयंभु मनु।
इसके उलट मत्स्य पुराण के अनुसार ब्रह्मा के पांच सिर थे। कहा जाता है जब ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की तो वह इस समस्त ब्रह्मांड में अकेले थे। ऐसे में उन्होंने अपने मुख से सरस्वती, सान्ध्य, ब्राह्मी को उत्पन्न किया।
ब्रह्मा अपनी ही बनाई हुई रचना, सरवस्ती के प्रति आकर्षित होने लगे और लगातार उन पर अपनी दृष्टि डाले रखते थे। ब्रह्मा की दृष्टि से बचने के लिए सरस्वती चारो दिशाओं में छिपती रहीं लेकिन वह उनसे नहीं बच पाईं।
इसलिए सरस्वती आकाश में जाकर छिप गईं लेकिन अपने पांचवें सिर से ब्रह्मा ने उन्हें आकाश में भी खोज निकाला और उनसे सृष्टि की रचना में सहयोग करने का निवेदन किया।
सरस्वती से विवाह करने के पश्चात सर्वप्रथम मनु का जन्म हुआ। ब्रह्मा और सरस्वती की यह संतान मनु को पृथ्वी पर जन्म लेने वाला पहला मानव कहा जाता है। इसके अलावा मनु को वेदों, सनातन धर्म और संस्कृत समेत समस्त भाषाओं का जनक भी कहा जाता है।
प्रजापति ब्रह्मा का अपनी ही पुत्री के प्रति आकर्षित होना और उसके साथ संभोग करना अन्य सभी देवताओं की नजरों में अपराध था। सभी ने मिलकर पापों का सर्वनाश करने वाले शिव से आग्रह किया कि ब्रह्मा ने अपनी पुत्री के लिए यौनाकांक्षाएं रखीं, जोकि एक बड़ा पाप है, ब्रह्मा को उनके किए का फल मिलना ही चाहिए। क्रोध में आकर शिव ने उनके पांचवें सिर को उनके धड़ से अलग कर दिया था।
शिव पुराण के अनुसार ब्रह्मा के सर्वप्रथम पांच सिर थे। लेकिन जब अपने पांचवें मुख से उन्होंने सरस्वती जोकि उनकी पुत्री थी, को उनके साथ संभोग करने के लिए कहा तो क्रोधावश सरस्वती ने उनसे कहा कि तुम्हारा यह मुंह हमेशा अपवित्र बातें ही करता है जिसकी वजह से आप भी विपरीत ही सोचते हैं।
इसी घटना के बाद एक बार भगवान शिव, अपनी अर्धांगिनी पार्वती को ढूंढ़ते हुए ब्रह्मा के पास पहुंचे तो पांचवें सिर को छोड़कर उनके अन्य सभी मुखों ने उनका अभिवादन किया, जबकि पांचवें मुख ने अमंगल आवाजें निकालनी शुरू कर दी। इसी कारणवश क्रोध में आकर शिव ने ब्रह्मा के पांचवें सिर को उनके धड़ से अलग कर दिया।
सरस्वती का अर्थ होता है बहाव। यह बहाव केवल पानी का नहीं बल्कि विद्या और कला का भी है। यही वजह है कि इन्हें विद्या और कला की देवी भी कहा जाता है। सरस्वती के द्वारा विज्ञान, संगीत और कविताओं की रचना की गई है। ऋग्वेद में सरस्वती को दैवीय नदी की भी संज्ञा दी गई है। साथ ही इन्हें पवित्रता और उर्वरता की देवी भी कहा गया है।
सरस्वती को अन्य नामों से भी पुकारा जाता है, जिनमें भागेश्वरी, सतरूपा, ब्राह्मी, पृथुदर, बकदेवी, बिरज, शारदा आदि प्रमुख हैं।